Tuesday, June 25, 2024
साहित्य जगत

सारस्वत की अँगनाई में नित….

हर सरिता का सागर से मिलन नहीं होता
बहता है जीवन, स्रोतों से निर्झरण नहीं होता|
सारस्वत की अँगनाई में नित कुसुम खिला करते हैं
सुरभि बनने तक सौरभ भी तपा करते हैं
समय वीथिका में हर मीरा का किसन नहीं होता|
बहता है…..
प्रणय के कितने ही अनुबंध नभ से पृथ्वी ने कर डाले
मेघों के उर में भी उठ गये नित छलिये छाले
पर अंबर का धरा से यूँ मिलन नहीं होता|
बहता है…..
पीयूष स्रोत- सी तरणि तनूजा बहती है
दो पाटों से अपने स्रवन- पल्लवन कहती है
शस्यश्यामलाम् भूर्जा कम ये प्रवर्धन नहीं होता|
बहता है…..
मझधार में होकर भी मझधार नहीं है वो
भँवर में भी किसका खेवनहार नहीं है वो
अधर मधुर गायन में किसके वो श्याम सजन नहीं होता!
बहता है…..

डॉ. बीना राघव

गुरुग्राम (हरियाणा)