बस्ती। विवादों से लगातार सुर्खियों में रहने वाले जिला पंचायत अध्यक्ष संजय चौधरी एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। इस बार मामला पटेल चौराहे पर लाखों रुपये की लागत से बनाए गए ‘लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल स्मृति द्वार’ की गुणवत्ता को लेकर उठे सवालों का है। आरोप है कि मुख्यमंत्री के प्रस्तावित हर्रैया दौरे से ठीक पहले तैयार कराए गए इस स्मृति द्वार में निम्नस्तरीय सामग्री का उपयोग किया गया, जिसके चलते उद्घाटन से पहले ही टाइलें टूटने लगीं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि जिस स्मृति द्वार को देश के महान स्वतंत्रता सेनानी और भारत के प्रथम गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल की स्मृति में बनाया गया, उसी निर्माण कार्य में गुणवत्ता के मानकों की अनदेखी की गई। लोगों का आरोप है कि लाखों रुपये खर्च होने के बावजूद निर्माण कार्य जल्दबाजी में और मानकों को दरकिनार कर कराया गया।
बताया जा रहा है कि स्मृति द्वार की टाइलें टूटने की सूचना मिलने पर मौके पर पहुंचे कुछ पत्रकारों को कथित तौर पर ठेकेदार से जुड़े लोगों ने तस्वीरें और वीडियो बनाने से रोकने का प्रयास किया। आरोप है कि टूटी हुई टाइलों को छिपाने और मामले को दबाने की कोशिश भी की गई। हालांकि इस संबंध में कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।
गौरतलब है कि जिला पंचायत अध्यक्ष संजय चौधरी का कार्यकाल शुरू से ही विवादों में रहा है। शपथ ग्रहण समारोह के दौरान संविधान को लेकर हुई टिप्पणी और श्रद्धांजलि देने की घटना ने उन्हें प्रदेशभर में चर्चा का विषय बना दिया था। इसके बाद जिला पंचायत कार्यालय के नवीनीकरण पर लाखों रुपये खर्च किए जाने के बावजूद पुराने भवन को ध्वस्त कर नए निर्माण का निर्णय भी सवालों के घेरे में रहा।
यही नहीं, जिला पंचायत द्वारा संचालित लोहिया मार्केट में पुरानी दुकानों को तोड़कर नए निर्माण और द्वितीय तल पर बनाए गए कार्यालयों की गुणवत्ता पर भी समय-समय पर सवाल उठते रहे। व्यापारियों और स्थानीय लोगों ने कई बार निर्माण कार्य को स्तरहीन बताते हुए जांच की मांग की थी।
अब कार्यकाल समाप्त होने से ठीक एक दिन पहले स्मृति द्वार के निर्माण को लेकर उठे सवालों ने एक बार फिर जिला पंचायत की कार्यशैली पर बहस छेड़ दी है। लोगों का कहना है कि यदि उद्घाटन से पहले ही टाइलें टूटने लगें तो निर्माण की गुणवत्ता का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। उनका कहना है कि सार्वजनिक धन से बनने वाली परियोजनाओं में पारदर्शिता और गुणवत्ता सुनिश्चित करना संबंधित विभाग की जिम्मेदारी है।
स्थानीय नागरिकों ने पूरे निर्माण कार्य की तकनीकी जांच कराने, गुणवत्ता की स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराने तथा दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों, ठेकेदार और संबंधित जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि महान विभूतियों के नाम पर बनने वाले स्मारकों में किसी भी प्रकार की लापरवाही न केवल सरकारी धन की बर्बादी है, बल्कि उन महापुरुषों के सम्मान के साथ भी अन्याय है।
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