Saturday, July 20, 2024
उत्तर प्रदेश

डॉ. कफील के लिए प्रियंका की सक्रियता, मुलायम की राह पर मुस्लिमों को कांग्रेस के करीब लाने की रणनीति का हिस्सा

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव भले ही डेढ़ साल के बाद होने हों, लेकिन सियासी बिसात अभी से बिछाई जाने लगी है। बीआरडी अस्पताल ट्रेजडी के बाद चर्चा में आए डॉक्टर कफील खान को इस साल फरवरी के महीने में मुंबई से गिरफ्तार किया गया था। जिसके बाद उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून भी लगाया गया था। डॉक्टर कफील खान पिछले आठ महीने से जेल के अंदर ही थे। बीते दिनों इलाहबाद हाईकोर्ट ने उनकी रिहाई के आदेश दिए। बीते कुछ वर्षों से विवादों में रहने वाले डॉक्टर कफील खान की रिहाई के बाद की कहानी और भी दिलचस्प है। रिहाई के बाद कफील खान ने जयपुर में प्रेस वार्ता किया जिसे कांग्रेस द्वारा आयोजित किया गया था। प्रियंका गांधी वाड्रा की टीम काफी पहले से कफील खान की रिहाई पर नजर टिकाये हुए थी और मौका मिलते ही उसे भुनाने में जुट गई।

डॉ. कफील खान को मथुरा जेल के गेट से लेकर जयपुर तक ले जाने का काम कांग्रेस नेताओं ने किया है। कांग्रेस की तरफ से माला-फूल और मिठाई लेकर पूर्व विधायक प्रदीप माथुर और पार्टी के अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के प्रमुख शाहनवाज आलम पहले ही मथुरा जेल के गेट पर डेरा डाले हुए थे। डॉ. कफील खान ने भी कांग्रेस के प्रति अपने झुकाव को दिखाया है। उन्होंने कहा, मुश्किल समय में, प्रियंका गांधी वाड्रा ने मेरा समर्थन किया। मथुरा जेल से मेरी रिहाई के बाद उन्होंने फोन करके मुझसे बातचीत की। डॉ. कफील प्रियंका गांधी की सलाह पर ही वो राजस्थान गए हैं, जहां कांग्रेस सरकार है। उन्होंने कहा भी कि राजस्थान में कांग्रेस की सरकार है, इसलिए हम यहां सुरक्षित रह सकते हैं। हमारे परिवार को भी ऐसा ही लग रहा है, क्योंकि यूपी जाएंगे तो कोई न कोई केस लगाकर फिर हमें जेल में डाल दिया जाएगा।

गोरखपुर के डॉक्टर कफील खान के लिए प्रियंका गांधी वाड्रा का स्पष्ट समर्थन कांग्रेस पार्टी की एक बड़ी रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत वो आने वाले चुनावों में उत्तर प्रदेश में ख़ुद को मुसलमानों के लिए एक भरोसेमंद विकल्प के तौर पर स्थापित करना चाहती है। कांग्रेस के कई सूत्रों का मानना है कि राज्य सरकार के खिलाफ उनकी लड़ाई ने उत्तरप्रदेश और अन्य राज्यों में समुदाय के लोगों के बीच बड़ी संख्या में समर्थन हासिल किया है।’

कांग्रेस यूपी में डॉक्टर कफील के जरिए मुसलमानों के बीच अपनी वापसी चाहती है। 90 के दशक में अयोध्या मुद्दे पर तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के स्टैंड ने उन्हें मुसलमानों के मसीहा के रूप में स्थापित किया था। तब मुलायम को ‘मुल्ला मुलायम’ तक कहा जाने लगा क्योंकि उन्होंने कारसेवकों पर गोली चलाने के आदेश दिए थे। मुलायम सिंह ने इसी दौरान समाजवादी पार्टी का गठन भी किया और उन्हें मुस्मिलों का नेता कहा जाने लगा। मुसलमानों की पहली पसंद समाजवादी पार्टी बनी और दूसरे नंबर पर उनका वोट बीएसपी को जाता रहा। मायावती के सबसे ज्यादा मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देने की बात और विधानसभा चुनाव के दौरान रैलियों में मुसलमानों के बसपा को ही वोट करने की अपील 2017 में देखने को भी मिला। लोकसभा 2014 के बाद देश के राजनीतिक परिदृश्य में आए बदलाव और खासतौर पर 2019 के लोकसभा चुनाव नतीजों को देखने के बाद एसपी और बीएसपी के स्टैंड में बहुत फर्क आया है। दोनों पार्टियां किसी भी सूरत मैं अपने मुस्लिम परस्त होने का ठप्पा नहीं लगवाना चाहती है। उनकी कोशिश पहले से लगे ठप्पे से किसी तरह छुड़ाने की भी है। यही वजह है कि दोनों पार्टियां डॉ कफिल का खुलकर पक्ष लेने से बचती दिख रही है। ऐसे में कांग्रेस को डॉ कपिल के साथ खड़े होने में अवसर दिख रहा है।