Saturday, June 1, 2024
साहित्य जगत

ग़ज़ल

ये आशिक़ तुम्हारे सयाने बहुत हैं।
सुना है कि इनके ठिकाने बहुत हैं।।
मिलेगा मुहब्बत में धोखा ही धोखा।
मुहब्बत में ग़म भी उठाने बहुत हैं।।
न छेड़ो यहां पे कोई साज़ हमदम।
कि लब पर हमारे तराने बहुत हैं।।
ज़रा बच के चलना मुहब्बत में जाना ।
कि आशिक़ तुम्हारे पुराने बहुत हैं ।।
अंधेरा यहां से मिटाना है हर्षित।
अंधेरों में दीपक जलाने बहुत हैं।
विनोद उपाध्याय हर्षित