Monday, April 15, 2024
साहित्य जगत

*मन*

हे,मन! बोलो?
व्यथा ग्रंथि के
अब तो खोलो,
हे,मन! बोलो?
दो शब्दों को..
विस्तार कभी
दो वेवजनों को
भार कभी..,
संतप्त हृदय
में कभी नहीं
अभिशप्त कुंठा
को…घोलो ..,
हे मन कुछ..
तो बोलो…?
साकार रहो,
निर्विकार हो तुम
अगणित पंथों के
द्वार हो तुम..!
हो , मुक्त कंठ
से बोलो….!
हे मन बोलो ?
सृजन का कोमल
हो प्रारूप…….
वृहद- विशाल
तेरा स्वरूप..!
मन कंचन
मन पावन
कर अमृत घोलो
हे मन बोलो!
व्यथा ग्रंथि के
अब तो खोलो!
आर्यावर्ती सरोज “आर्या”
लखनऊ (उत्तर प्रदेश)