Sunday, April 21, 2024
साहित्य जगत

*न्याय की गुहार*

चिरवती तनहाईयों ने
जप्त कर ली दर्द सारे
इस गहन तिमिर निशा में
कब ?कहां ? सूरज हंसेगा
कब छंटेगा घन अंधेरा ?
आयेगा अब कब सबेरा?
बन विचरते मुक्त पंथी
घुमते हैं स्वछंद दोषी ,
पर निकल आए जो कोमल
कुतर दे, तू पर तुम्हारे,
ओ परिंदे भर उड़ान न
धरती और आकाश सारे,
कर चुका आग़ाज़ बाज
नोचने को पर तुम्हारे ,
छुप जा अपने नीड़ में तू
ताक में हैं गिद्ध सारे ,
देख दानव फिर रहें हैं
घर जलाने को तुम्हारे,
मुक्त हैं, आज़ाद हैं ये
फिर कुकृत्य करने को सारे,
क्या सज़ा इनको मिलेगी?
पूछतीं लाचार मांए ……,
न्याय का करके गुहार
थक गए चक्षुएं बेचारे!!
आर्यावर्ती सरोज “आर्या”
लखनऊ ( उत्तर प्रदेश)