Monday, April 15, 2024
साहित्य जगत

*तुम मेरे भीतर हो* =आर्यावर्ती सरोज

खुद में कहां जीती हूं
खुद में कहां रहती हूं
तुम्हारा कुछ छूट गया है-
मुझमें-….
उसे ही बुनती- गुनती रहतीं हूं,
भींड में रहकर भी अक्सर
तन्हा रहतीं हूं………
आंखें तुम्हें ढूंढ़ती हैं…
तुम्हें ही देखना चाहती हैं,
जब कि- एक पल को भी
आंखों से ओझल नहीं होते
तुम जुदा नहीं होते दिल से,
ध्यान मग्न साधना साधे
मैं उपासिका बन……!
करती रहती हूं तुम्हारी उपासना
हर पल निर्निमेष …
तुम्हें देखती रहती हूं,
तुम ! बाहर कैसे मिलोगे?
छुपे हो भीतर मेरे..!
फिर भी ढूंढ़ती रहती हूं
कानन- कानन कस्तुरी,
या फिर, जैसे-
किसी शब्द के अर्थ को
शब्दकोष में या फिर-
गूगल पर ,
मैं भी ढूंढ़ती रहती हूं तुम्हें !
अज्ञात नहीं, जानती हूं..
तुम प्रतिष्ठित हो मेरे भीतर,
फिर भी- खोई -खोई सी रहती हूं
अर्धविक्षिप्त सी……,
ध्यान मग्न तुम्हारी खोज में
फिरते रहते हैं योगी – संन्यासी
जैसे-कंदराओं में – गुफाओं में,
मैं भी तलाशती रहती हूं…..!
जानती हूं तुम मेरे भीतर हो!
और,देखो ना !
जब से तुम मेरे भीतर प्रविष्ट हुए हो
मैं स्व से भटक गई,
और तुमको ढूंढ़ती रहती हूं,
सुनो ! ऐसे ही ज़िन्दा रहना
तुम सदा ही मेरे भीतर !
एक जीवन्त अहसास बनकर
मेरे मरने के बाद भी….!
नहीं, भ्रमित नहीं मैं !
गन्तव्य हो मेरा ,
तुम तक पहुंचना ही
ध्येय है मेरा !
किन्तु, फिर मैं तुम्हें!
बाहर क्यों ढूंढ़ती हूं ?
जब तुम मेरे भीतर हो !
हर पल – हर क्षण
तुम तो कहा करते हो
कि तुम आत्मा हो ,रूह हो
तुम ! मेरे भीतर हो ।।
आर्यावर्ती सरोज “आर्या”
लखनऊ (उत्तर प्रदेश)