Saturday, July 20, 2024
साहित्य जगत

मौन को उत्सव बनाओ…..

मौन को उत्सव बनाओ
मौन को उत्सव बनाओ,
दर्द को जीना सिखाओ
अब किसी भी
जंग से डरती नहीं है जिन्दगी,
अब किसी भी
चुभन से रुकती नहीं है जिन्दगी ।
आंधियों से जो लड़ा है
वही तो हिमगिरि बना है
धूप में जो भी तपा है
गुलमुहर सा वह खिला है
दर्द को दर्पन बनाओ ,
धैर्य को जीना सिखाओ ,
अब किसी भी
चुभन से रुकती नहीं है जिन्दगी ।
जिन्दगी जो हल चलाती
वही तो मधुमास लाती ,
पतझड़ों की गली में भी
फसल को जीना सिखाती ।
प्यास को बादल बनाओ
अश्रु को हंसना सिखओ
अब किसी भी
हार से थकती नहीं है जिन्दगी ।
स्वेद की जब नदी गाती
प्यार की पफसलें उगाती,
एक मुठठी धान से भी
जिन्दगी है गुनगुनाती
हाथ को हथियार कर लो,
पांव को रफ्रतार कर लो,
अब किसी भी
जुल्म से झुकती नहीं है जिन्दगी ,
अब किसी भी
जंग से डरती नहीं है जिन्दगी ।
राधेश्याम बन्धु
बी-3163 , यमुना विहार, दिल्ली-110053