Wednesday, July 24, 2024
साहित्य जगत

बाहर जाने के लिए मन होता….

बाहर जाने के लिए मन होता भयभीत।
उसके अधरों पर रचे कैसे मादक गीत।
अब भी आते हैं नहीं मन में नेक विचार।
पनप रहा है देखिए कितना भ्रष्टाचार।
काले बादल व्यथा के गरज रहे घनघोर।
नहीं रास्ता दिख रहा जाएं अब किस ओर।
प्रकृति नटी से किया है मानव ने तकरार।
इसीलिए नित कर रहा कोरोना संहार।
घोर निराशा हो रही है देख आज का हाल।
देखें कब तक गलेगी कोरोना की दाल।
डॉ. वी. के. वर्मा
चिकित्साधिकारी
जिला चिकित्सालय बस्ती