Monday, April 15, 2024
साहित्य जगत

( कविता) *कब तक?*

कब तक?
आखिर कब तक?
बेटियों की ज़िंदगी
रहेगी हासिए पर
कब तक ?
आखिर कब तक ?
गृह कलह हो चाहे,
हो चाहे कोई और वजह,
उसकी आपूर्ति बेटियां क्यों ?
सामाजिक बलि बेदी पर
बेटियां क्यों….??
दामिनी,निर्भया,आसिफा,अरुणा
ये तो बस मुखौटे हैं.
वर्ना प्रत्येक 18 मिनट पर
चढ़ती है, एक बेटी बलात् बेदी पर
उनको कोई नहीं जानता
उनको न्याय नहीं मिलता
यह अमानवीय कृत्य क्रीड़ा
है मनोवृत्तिक घृणा…
कब तक ?
आखिर कब तक ?
अमानुषता , अमानवीयता
की पराकाष्ठा है …..
हाथरसी यू पी कांड
पुलिस का घिनौना रूप
जो छुपकर बनते सांड
प्रशासन की ढ़ीलता
और क्रूरता………..
क्या यूं ही चलेगी ?
बेटियां ऐसे बचेंगी ?
बेटियां कैसे पढ़ेंगी ?
बेटियां बलात्कार के
भेंट कब तक चढ़ेंगी ?
कब तक ?
आखिर कब तक ?
आर्यावर्ती सरोज “आर्या”
लखनऊ (उत्तर प्रदेश)