Sunday, April 21, 2024
साहित्य जगत

गीत

कहां खो गया गांव,, हमारा कहां खो गया गांव,,,।

सूरज बदला तारे बदले
गांव गली गलियारे बदले
पनघट सूना paniharin बिन
अब तक नहीं किनारे बदले
बूढ़े पीपल के पेड़ों की कहां खो गई छांव।हमारा,,,,,,,,,।
आज पुरानी प्रीत खो गई
नई, नई अब रीति हो गई
भाई का वह प्रेम कहां है
और वह कुशल क्षेम कहां है
कागा किसी मुंडेर बैठ कर बोले ना अब कांव।हमारा,,,,।
पेड़ों पर झूलों की कतारें
सावन की रसभरी फुहारें
यौवन झूले ना झूलों पर
कजरी ना सावन के मेले
रिमझिम बुंदिया बरस रहीं पर नहीं थिरकते पांव।हमारा,।
पूरब की सभ्यता खो गई
लाज शर्म और हया खो गई
आंखों में झलके मक्कारी
मानस पर छाई लाचारी
पश्चिम की सभ्यता पैठती आज पसारे पांव।हमारा,,,,,,,,।
नदियां बहती जहां दूध की
कृष्ण का ऐसा देश कहां है
मर्यादा का पाठ पढ़ाए ऐसा
आज नरेश कहां है,,,,,,,,
अपनी, अपनी जुगत में बैठे लगा रहे सब दांव।हमारा,,,,,।
गीता त्रिपाठी “गीता “
अम्बेडकर नगर
9451203694