Sunday, April 14, 2024
साहित्य जगत

ग़ज़ल

हमारी राह में आए तो पर्वत तोड़ देते हैं!
ज़रूरी हो तो दरिया के भी रुख को मोड़ देते हैं!!
भरत हैं राम लक्ष्मण हम हमारा इम्तहाॅ मत लो !
पिता के इक इशारे पर अयोध्या छोड़ देते हैं!!
विभीषण की तरह आये लगा लेते हैं सीने से!
दशानन की तरह आये तो गर्दन तोड़ देते !!
बिठाते हैं उसे सिर पर,करे सम्मान नारी का!
बुरी नजरों से देखे,आॅख उसकी फोड़ देते हैं!!
सियासत और मजहब के हथौड़े तोड़ते जिनको!
उन्ही टूटे दिलों को हम कलम से जोड़ देते हैं!!
दिया है एक माटी का,इसे “दीपक”बना के रख!
ये बढ़ता है,अॅधेरे खुद ही रस्ता छोड़ देते हैं!!
डाॅ0ज्ञानेन्द्र द्विवेदी दीपक
बांसी/सिद्धार्थनगर  (उ0प्र0 )