Tuesday, April 16, 2024
साहित्य जगत

ग़ज़ल

हो गये जो इस व्यवस्था मे तबाही की नज़र
उनपे जाती ही नहीं ज़िल्ले इलाही की नज़र
आपकी बातों मे हैं बस आपकी ही ख़ूबियाँ
मसअले तो हो गये सब वाहवाही की नज़र
साँस लेते ही हुआ जम्हूरियत का अंग भंग
इस कदर टेढ़ी हुई है राजशाही की नज़र
देखता है कोई इसमे राज सिंहासन का द्वार
कोई रखता है धरम पर धन उगाही की नज़र
याख़ुदा अब मैकशों की तिश्नगी तेरे सुपुर्द
मयकदे के ठीक उल्टी है सुराही की नज़र
हरीश दरवेश
बस्ती (उत्तर प्रदेश)